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Sunday, March 9, 2014

तपस्वी बनाये शनि




  • कुंडली में पंचम भाव से ईश्वर प्रेम और नवम भाव से धर्म विषयक अनुष्ठान आदि का विचार किया जाता है। नवमेश एवं पंचमेश में अर्थात भक्ति एवं अनुष्ठान दोनों में शुभ सम्बन्ध हो तो जातक उच्च श्रेणी का साधक बनता है । दसम स्थान को कर्म  स्थान कहते हैं । इसलिए पंचमेश , नवमेश अथवा दसमेश से सम्बन्ध हो तो फल में उत्कृष्टता आ जाती है ।
  • शनि एक न्यायकारी ग्रह है । य़ह जातक की कठिन परीक्षा लेकर उसके विचारों को शुद्ध और पवित्र कर देता है . शनि का समबन्ध नवम, पंचम या नवमेश  या पंचमेश से हो तो जातक तपस्वी बनता है।
  • जन्म  कुंडली में चार , पांच , छह या सात ग्रह एकत्रित होकर किसी एक राशी में बैठें हों , तो ऐसा जातक सन्यासी होता है . परन्तु इन सब ग्रहों में एक ग्रह का बलि होना आवश्यक है. केवल चार या चार से अधिक ग्रहों के एकत्रित होने सन्यास योग नही बनता है. उनमें से एक ग्रह  का दशमेश या दशम से सम्बन्ध होना तथा  एक ग्रह  का बलवान होना जरुरी है.
  • सूर्य प्रव्रज्या कारक  हो तो जातक वन, पर्वत या नदी किनारे आश्रम में धूनी  रमाकर  रहता है. सूर्य गणेश व शक्ति का उपासक व ब्रह्मचारी बनाता है.
  • चन्द्रमा प्रव्रज्या कारक  हो तो जातक श्रावक, एकांतवासी एवं देवी भक्त होता है.
  • मंगल प्रव्रज्या कारक  हो तो जातक बौद्ध धर्म का उपासक , गेरुवा वस्त्रधारी , जितेन्द्रिय, भिक्षावृति लेने वाला सन्यासी होता है .
  • वृहस्पति प्रव्रज्या कारक  हो तो जातक भिक्षुक, दंडधारी, तपस्वी, धरम शास्रों के रहश्य को खोजने वाला , ब्रह्मचारी, ततः गेरुवा वस्त्रधारी होता है.
  • शुक्र प्रव्रज्या कारक  हो तो जातक वैष्णव धर्म परायण , व्रतादि करने वाला सन्यासी होता है. भक्ति द्वारा अर्थ साधना उसका लक्ष्य होता है.
  • शनि प्रव्रज्या कारक  हो तो जातक दिगंबर, निर्वस्त्र रहने वाला , फ़कीर और कठोर तपस्वी होता है.
  • चार या चार से अधिक ग्रह एक राशी में एकत्रित होने पर सन्यास प्रवृति होती है. लग्न एवं चंद्रमा से मनुष्य के शरीर एवं मन का विचार होता है. लग्न व चन्द्रमा का सम्बन्ध जब शनि से हो तो जातक सन्यासी होता है.
  • यदि लग्नाधिपति पर किसी ग्रह की दृष्टि शनि पर हो तो सन्यास योग बनता है. शनि पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो तो तथा  शनि की दृष्टि लग्नधिपति पर पड़ती हो तो सन्यास योग होता है. शनि की दृष्टि निर्बल लग्न पर पड़ती हो , चन्द्र रशिपति अर्थात  जन्म कालीन चन्द्रमा जिस राशी में हो उसके स्वामी पर किसी गृह की दृष्टि न हो परन्तु राशिपति  पर शनि की दृष्टि हो तो ऐसा जातक को शनि अथवा राशिपति  में जो बली   हो उसकी दशा, अन्तर्दशा में सन्यास योग होता है.
  • जन्म  राशी निर्बल हो , उस पर बलि शनि की दृष्टि हो तो सन्यास योग बनता है.
  • चन्द्रमा शनि के प्रभाव में हो और उस पर शनि की दृष्टि हो अथवा चन्द्रमा शनि अथवा मंगल के नवमांश में हो और उस पर शनि  की दृष्टि हो तो सन्यास योग बनता है.
  • शनि नवम स्थान में हो उस पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो तो ऐसा जातक राजा  होने पर भी सन्यासी होता है, और कभी कभी सन्यासी होने पर भी राजतुल्य हो जाता है.
  • चन्द्रमा नवम स्थान में हो और किसी भी ग्रह से दृष्ट न हो तो राजयोगादी रहते हुए भी सन्यासियों  में राजा के सामान होता है.
  • चन्द्र-मंगल एक राशी में हो तथा उस पर शनि की दृष्टि हो तो जातक सन्यासी होता है.
  • शनि और वृहस्पति साथ होकर नवम  या दसम में उपस्थित हों और एक ही नवमांश में हो तो जातक सन्यासी बनता है .
द्वारा
गीता झा